रविवार, 3 जनवरी 2021

किसान धरनारत लोकगीत ब्रजभाषा

किसान धरनारत( 03012020)

मेरे भारत की आत्मा और प्रान रे
काहे धरने पे बैठयो है किसान रे 

हठ काहे सरकार ,की हठीली हैं
छोड़े छाड़े सोच,पाली जहरीली है
नाय मटके किसानन कि कीली है
करें सबकी लंगोंटिया यू गीली है
माँग सच्ची जाकी, सब लेउ मान रे 
काहे धरने पे बैठगो किसान रे 

ये तो दुनिया मे सीधो भोलो भालो रे
छीने काहे काजे याही को निवालों रे
जाको निकरो ही पड़ो है दिवालो रे
करें रात दिन बड़ो ही कसालो रे
है पस्त जाको पूरो खानदान रे

काहे धरने पे बैठयो है किसान रे 
घर झोपड़ी है,जान पड़ी खेत मे
 रहे लिपटेमा आठो याम रेत में 
नाहे कौरा जाये चैन तेऊ पेट मे
नाय मिलती दुहन्नी जाय भेंट में
जाके मुफ्त में ही बिकें गेँहू धान रे
काहे धरने पे बैठयो है किसान रे ।

खेती आलू गोभी,कोई बागवानी है
बीज महंगों मिले, मिले नाय पानी है 
महँगी बिजली से,आफत किसानी है
टिड्डी दल, चौंपा ,ओले तूफानी है
खेती सबइ मुसिबतन की खान रे
चौ धरने पे बैठायो किसान रे ।

टोटे मद्दे मे ही ,पालै संतान कू
खुद भूखों रहे अन्न ,हिंदुस्तान कू
जिंदा रखतो सदा ही स्वाभिमान कू
मेरो कोटिक प्रणाम,है किसान कू
जाको छोरा ठाड़यो,सीमा पे जवान रे ।

काहे धरने पे बैठयो है किसान रे

अंधी बहरी बनबैठी सरकार है 
खुद अपनो से करें तक़रार है
सत्ता दम्भ के ही सब आसार है
भेजू लानत हजार बार बार है 
लेउ बापस हठीली हठ ठान रे ।

काहे धरने पे बैठयो है किसान रे 

मेरे भारत की आत्मा और प्रान रे 
काहे धरने पे बैठयो है किसान रे ।

एक रात कोही रैन बसेरा है
उड़ जानो कल होंत सबेरा है
छट जानो सब घनो अंधेरा है 
काहे पक्षपात करे तेरो मेरा है 
हाय पल में ही झड़ जाय गुमान रे
काहे धरने पे बैठ्यो है किसान रे 

रूपेश धनगर,पचावर
बालाजीपुरम, मथुरा
मो-9410490520