निराश्रित गाय
गीत
मेरा जर्जर बदन, इस भरे शहर में, अब किसी को भी देता दिखाई नही
में व्यथित हो चली, मरती पग पग रही, आँशुओ में ढली पर रंभाई नही
बाग उजड़े मिटा है बसेरा मेरा
अब तो कूडो के, ढेरों में डेरा मेरा
यातनाएं सहू , गॉव गलियों रहू
लोग कम है जिन्होंने सताई नही
ठौर मुझको कहाँ, बस्तियां है घिरी
और मेरे नाम से, योजनाएं निरी
लाठी,डंडों से चोटिल, है मेरा बदन
अस्पतालों में मिलती दवाई नही
जाम दारू के, जब से उड़ाने लगे
पीज़ा बर्गर अमूलो, से खाने लगे
दूध,मक्खन, मठ्ठा की रही चाह ना
ग्वाल बालो को, भाती मलाई नही
पुस्त मेरी मिटी है, तुम्हे सींचते
पूत मेरे मरे, हल तेरे खींचते
अब तो नंदी भी, कट्टी में कटने लगे
अब हलो से भी होती बुबाई नही
मठ में चांदी की धेनु, दिखाते खड़े
मुझको भी भूखा रखके, चढ़ावे बड़े
गाय गोवर से फंडिग, विदेश यहां
दूध माखन में उतनी, कमाई नही
उजड़े मधुवन को, धनगर सवारे यंहा
नख पे गिरबर उठाये, वो ग्वाले कहाँ
हर तरफ बस्तियों में, गड़रिये बसे
आज इनमें भी कोई, कन्हाई नही
मेरा जजर्र बदन ,,,,
रूपेश धनगर
मथुरा
9410490520
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