राह सही दिखलाने बाली
खुद रस्ते से भटक गयी है
अन्दर जिसके संसार समाया
गुण जिसका देवो ने गया
रहती बनकर HARDAम छाया
सुख सागर कहलाने बाली
क्यों दुखादो मै उलझ गयी है
अब क्यों जननी....................
त्याग प्रेम ममता की जननी
तीन लोक को तारन तारिणी
हसकर भार उठती धरिणी
जग का भार उठानी बाली
जग का भार उठानी बाली
बन क्यों खुद पर बोझ गयी है
अब क्यों जननी बदल ........................
बच्चो को स्तन ना देकर
हाथो मै बोतल भर देकर
फिगर बिगड़ जाने की
मन मै आशकाए लेकर
अमृत रस बरसाने बाली
क्यों अमूल पर ठहर गयी है
अब क्यों जननी बदल गयी ....................
गोद छीनकर बच्चो की
ट्रोली मै डाले जाते है
माँ के आँचल मै ना छुपकर
अठखेली कर पाते है
दूर जिगर से जिगर के टुकड़े
जाने कैसे रह पाते है
दोस यही है बस उनका
ना मुख से कह पाते है
गोद छोड़ बच्चो की दुनिया
क्यों ट्रोली मै बदल गयी है
अब क्यों जननी ..........................
दादा दादी के हाथो मै
किलकारी भरता है बचपन
कुल टूटे सयुंक आजकल
बिखर के बिगड़ा है जीवन
लटकी खाल बुदापे की को
इन महलो मै जगह कहा
रह सकते ना बृद्ध पुरुष
हो जिनका अपमान जहा
एन्कांकी जीवन की ज्वाला
अब बचपन पर दहक गयी है
अब क्यों जननी बदल गयी ................................
आधुनिकता की होड़ बड़ी है
जीने के सब नियम वही है
बड़ी दिखावे की दुनिया बस
जनन प्रजन के नियम वही है
बछ्य मै दूध उमड़ता अब भी
स्तन नहीं पिलाती है
गोद बनी देहाती फीलिंग
गोद नहीं सुलाती है
सारे जग की पालन कर्ता
क्यों कर्मो से मुकर गयी है
अब क्यों जननी ...........................................
रुपेश धनगर
मथुरा
९६५४४४११८६
सुख सागर कहलाने बाली
क्यों दुखादो मै उलझ गयी है
अब क्यों जननी....................
त्याग प्रेम ममता की जननी
तीन लोक को तारन तारिणी
हसकर भार उठती धरिणी
जग का भार उठानी बाली
जग का भार उठानी बाली
बन क्यों खुद पर बोझ गयी है
अब क्यों जननी बदल ........................
बच्चो को स्तन ना देकर
हाथो मै बोतल भर देकर
फिगर बिगड़ जाने की
मन मै आशकाए लेकर
अमृत रस बरसाने बाली
क्यों अमूल पर ठहर गयी है
अब क्यों जननी बदल गयी ....................
गोद छीनकर बच्चो की
ट्रोली मै डाले जाते है
माँ के आँचल मै ना छुपकर
अठखेली कर पाते है
दूर जिगर से जिगर के टुकड़े
जाने कैसे रह पाते है
दोस यही है बस उनका
ना मुख से कह पाते है
गोद छोड़ बच्चो की दुनिया
क्यों ट्रोली मै बदल गयी है
अब क्यों जननी ..........................
दादा दादी के हाथो मै
किलकारी भरता है बचपन
कुल टूटे सयुंक आजकल
बिखर के बिगड़ा है जीवन
लटकी खाल बुदापे की को
इन महलो मै जगह कहा
रह सकते ना बृद्ध पुरुष
हो जिनका अपमान जहा
एन्कांकी जीवन की ज्वाला
अब बचपन पर दहक गयी है
अब क्यों जननी बदल गयी ................................
आधुनिकता की होड़ बड़ी है
जीने के सब नियम वही है
बड़ी दिखावे की दुनिया बस
जनन प्रजन के नियम वही है
बछ्य मै दूध उमड़ता अब भी
स्तन नहीं पिलाती है
गोद बनी देहाती फीलिंग
गोद नहीं सुलाती है
सारे जग की पालन कर्ता
क्यों कर्मो से मुकर गयी है
अब क्यों जननी ...........................................
रुपेश धनगर
मथुरा
९६५४४४११८६