भीगता रहा हू मै भीगने की चाह है
सुख की न आश कोई , दिल मै बस कराह है
चोट भी जिगर पे सह
अश्क को समो रहा
आंशुओ की धार मै
बदन को भिगो रहा
भीगते समां का ये अश्क ही गवाह है
भीगता रहा हू ......................
कोशिशे नाकाम है
ताकुल्लाफ़ न ख़ुशी से
आज रो रहा हू
मै डर-डर के हंसी से
गुलशन -ए-वीरान का हर मौसम ही तवाह है
भीगता रहा हू ....................................
भटकता रहा दर बदर रह मै
आई न सूरत अब तक निगाह मै
छूटी मंजिले बस बची बाह -बाह है
रुपेश धनगर
मथुरा
९६५४४४११८६
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