निराश्रित गाय
07112020
आपकी समीक्षा में ।
निर्झर सी अंशुअन की धारा,जर्जर बदन लिये डोले।
दींन हींन बलहीन गाय की ,ब्रज में पीड़ा को बोले ।।
बड़े-बड़े मठ मंदिर ब्रज के,गइयन के रखबारे है ।
लेकिन उदर गाय का खाली,उत बारे के न्यारे है ।।
निष्ठुर चारा खाय रहे है,यहाँ पर मोहड़ो को खोले
दींन हींन ...............
गायें कचरा फांक रही है,तरसी दाना पानी को ।
निरी योजनाएं दफ्तर में ,लगा रही है सानी को ।
भृष्ट तंत्र के काले चिट्ठे,ढांकी खोले को पोले ।
दींन हीन बलहीन गाय......
खलिहानों पर बनी हवेली,सिकुड़ गयी नदिया झीलें ।
चारागाह उजाड़ बनो को ,ताक रही बैठी चीले ।
झूठ स्वार्थ फल फूल रहा है ,,सच को डंका को बोले ।
दींन हींन बलहीन ,,.....
एक तरफ मैया कह बोले,बेटा क्यो दुत्कार रहे ।
राजनीति में मुद्दा गायें, बना वही सरकार रहे ।
भूखी जर्जर सिसक रही है,वो पीट रहे अपनी ढोले ।
दींन हींन बलहीन गाय की ,ब्रज में पीड़ा को बोले
रूपेश धनगर मथुरा
मो 9410490520