सोमवार, 10 अक्टूबर 2022

रसिया धनगर गीत

रसिया धनगर गीत

बहन धनगर ने जुल्म गुजारियो 
सपने में बादर फारियो

1-धनगर रात स्वप्न में आयो 
    मेरो रोम रोम  हर्षायो 
  प्रकट भयो घर मेरे बंशी बारो
 सपने में बादर ----------

2-श्याम रंग और बदन गठीला 
   जवानी में लग रहयों संजीला 
 बहन जीतो काली कमली बारों
सपने में -----------------

3- हंस हंस के मोते बतरायो 
    बातन में मनुआ भरमायो
अरी री जानें केसों जादू डारो 
सपने में ------------

4-जबरन दीन्ही मोड़ कलाई 
   लाजन मारी बहुत शरमाई 
अरी रीजीतो मान्योना बजमारो
सपने में --------
5-अंग अंग में जादू डारो
  जैसे नाग डस गयो कारो
 अरी री वो तो झूम रहो मतवारो
सपने में ----------

6-आंख खुली हिल्की भर रोई
    तन मन की सब ,सुधि बुद्धि खोई
"धनगर" लुक्यो  "पचावर" बारो
सपने में बादर फारियो


रुपेश धनगर ,मथुरा
9410490520

शनिवार, 22 जनवरी 2022

चुनावी गीत 2022

चुनावी गीत 

ब्रज भाषा लोकगीत  की प्रस्तुति 
रुपेश धनगर मथुरा

धनगर भैया विनती कर रहे, यू पी की सरदारी ते ।
सोच ,समझके वोट करो तो,बचे रहो दुश्वारी ते ।।
 
घर घर में यूं पी की जनता,महंगी बिजली कू रोवे
मीठो पानी मिल नाय पायो, मैया मूढ़न पे ढोबे
बंदर काट रहे चौड़े में,   दहशत में है नर नारी
छुट्टा सांड चरें खेतन में, उजड़ रही खेती वाडी
खेत बचाने कौ मौकों है, कन्हू आज हलधारी ते
सोच समझके वोटिंग करियो,,,,,,,,,,

गौशालाएं चले नाम की, गैया खेतन में डोले 
लाश ने ते गंगा पट जाबे,झूठ पुलिंदा के खोले 
अत्याचार बढे बिटिया ने पे,थाने में जल रही नारी
राया,सुरीर,उन्नाव,हाथरस, जुर्म सहे इन ने भारी
आंखन से जलधार, रोय रही हूकभरी सिसकारी ते
सोच समझकर वोटिंग करियो,,,,,,,,,,,,,,

लखनऊ से आदेश करें पर,देखो इनकी चतुराई 
धनगर भटक रहें सड़कन पे, बहरी सरकार न सुनपाई
चुन चुन के mla,mp, मंत्री बन कुर्सी हथियाई
विरोध प्रदर्शन धरना रैली,कोई काम नही आई
कंश राज में dm,cm, छोटे है पटवारी ते 
सोच समझके बोटिंग करियों ,दूर रहो दुश्वारी ते ।



मौलिक एव सर्वाधिकार सुरक्षित
कवि/लेखक
रुपेश धनगर मथुरा
9410490520

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

महंगाई

महँगाई

अब तो मित्रो प्राणों पर बन आई है ।
सर से ऊँची बेदर्दी महँगाई है ।



दाम तेल के सौ रुपया से ऊपर है ।
महामारी में धेला नही कमाई है ।

विधालय भी बंद पड़े हैं सालों से
पर मधुशालाओ पे रंगत छाई है  ।

गयीं नौकरी हाथ धरे बैठे घर में
नेताजी की रैली में अंगड़ाई है ।


अस्पताल में प्राण बायु की किल्लत है
अब तो यारो मुश्किल हुई दवाई है ।

झूठे वादे ,बात फरेबी है मनकी
ऐशे लगती जैसे बालूशाही है ।


कल परसों जो डायन डायन कहते थे ।
अब रिश्ते में उनकी ही भौजाई है ।

रूपेश धनगर ,मथुरा
मो-9410490520

झूठा चाय बाला

गीत

बड़ा झूठ बोले तू ओ चाय बाले
लगा छिनने क्यों,मुँह के निबाले

तेरी झूठी बातों में खुद को फँसाया
ये जा तुझपे बारी,ये दिल भी लुटाया
किया है बतन सारा तेरे हवाले
लगा छिनने क्यूँ मुँह के निबाले 

2-हर वक्त लंबी लंबी लाइने       लगाई
मिला ना सिलेंडर तेरा,मिली न दवाई
बात मानले थोड़ा रहम हमपे खाले
लगा छीनने क्यू -------------- 

3 -बंद है मदरसा कब से हुई ना पढ़ाई
पूरी पूरी फीस,और ये बढ़ती महँगाई
निकले पडे यहाँ पे सबके दिवाले
लगा छीनने क्यू मुँह के निवाले

4-छपता है झूठ सारा,खूब अखवार में 
बोलता खिलाफ जो भी,खीँचे दरवार में 
खुलते राज सारे,चाहे जितना छुपाले

लगा छिनने क्यू मुँह के निवाले 





रूपेश धनगर मथुरा
मो-9410490520

शनिवार, 13 नवंबर 2021

निजीकरण

निजीकरण 
              ब्रज लोक गीत
           (25/01/2021)

निजीकरण की मंडी,बिक रहयो ,भारत देश हमारौ 
इन भक्तन नै बादर फ़ारो

बढ़ती जाय रही पीर,जिगर कौन करें निपटारौ

इन भक्तन ने बादर फारौ 

विद्यालय गए निजीकरण में,मोटी फीस बढामें 
निर्धन कू न मिले पढ़ाई,दर दर ठोकर खामे 
जान बूझकर पड़े नरक में,अपनो जन्म बिगारौ
इन भक्तन ने बादर फारौ


पढ़बे लिखबे नाय मिले, बंधुआ मजदूर बनोगे
शोषण,अत्याचार यातना ,नित नई रोज सहोगे
करो गुलामी पस्त रहोगे, मिले नही छुटकारौ

इन भक्तन ने बादर फारौ

पूत अमीरों के सुख साधन,बाँट देश के लेंगे
तेरी नींद हराम,चाम भी तन से खिंचवा लेंगे 
जिधर मिलोगे ,दुमे हिलाते कर दें नाश तुम्हारौ

इन भक्तन ने ......................

अंधभक्त बजाय रहे ताली,तन मन की सुध भूले
घर में दरिया ,दार मिले ना,बुझे पड़े है चूले
गयी भुखमरी फैल देश मे,अब भट्टा बैठारो

इन भक्तन ने  बादर फारौ


निजीकरण को दमन करौ, मिलकर आवाज उठाओ
गूंगी बहरी सरकारों के पर्दे 
आज हिलाओ
नाय जगे तौ भरी दुपहरी ,चमके  चंदा तारौ

इन भक्तन ने बादर फारौ

बढ़ती जाय रही पीर जिगर की 
कौन करे निपटारौ

निजीकरण की मंडी बिक रह्यो ,भारत देश हमारौ 
इन भक्तन ने बादर फारौ

रूपेश धनगर ,मथुरा
मो-9410490520

किसान धरने पर

ब्रज लोक गीत
          (04/01/2021)

दोय महीना से दिल्ली बॉर्डर पे बैठे हलधारी ।
नाय बापस ले कानून,राज बेदर्दी न को भारी ।

भारत सबरो बंद,दुबक रहे घर मे नर नारी ।
लाये काले कानून देश मे निष्ठुर सरकारी ।
ना चर्चा,कोई बहस करी सड़यन्त्री तैयारी ।

नाय वापस.....................

सुनके खबर अन्नदाता को,हियो बोल गयो ।
छीने निवाले पुस्तन के,दिल्ली तक ढोल गयो ।
सब भये इकट्ठे पंच, जुट गई सारी सरदारी ।

नाय बापस .......................

मौन प्रदर्शन धरना रैली,हलधर ने कर ली ।
पानी की बौछारें सीधी ,सीने में भर ली ।
सर्दी न कि ठिठुरी रात ,झुकी नाय इनकी खुद्दारी ।
नाय बापस ले .....................

 हक्क हकूक कू लामबंद,छोड़ी खेती बाड़ी
कर दई दिल्ली जाम,साथ महिला है गई ठाड़ी 
कंहू छुप गयो चौकीदार ,देख लई सब चौकीदारी 

नाय बापस ........................


कैसो है अन्याय,अडिंग है कैसे अन्यायी
मुँह पर मीठे बोल,रूप शैतानी परछाई
चेनल सब गूंगे भये,देश मे कैसी लाचारी 

नाय बापस ले ..................


रूपेश धनगर ,मथुरा
मो.9410490520

रविवार, 3 जनवरी 2021

किसान धरनारत लोकगीत ब्रजभाषा

किसान धरनारत( 03012020)

मेरे भारत की आत्मा और प्रान रे
काहे धरने पे बैठयो है किसान रे 

हठ काहे सरकार ,की हठीली हैं
छोड़े छाड़े सोच,पाली जहरीली है
नाय मटके किसानन कि कीली है
करें सबकी लंगोंटिया यू गीली है
माँग सच्ची जाकी, सब लेउ मान रे 
काहे धरने पे बैठगो किसान रे 

ये तो दुनिया मे सीधो भोलो भालो रे
छीने काहे काजे याही को निवालों रे
जाको निकरो ही पड़ो है दिवालो रे
करें रात दिन बड़ो ही कसालो रे
है पस्त जाको पूरो खानदान रे

काहे धरने पे बैठयो है किसान रे 
घर झोपड़ी है,जान पड़ी खेत मे
 रहे लिपटेमा आठो याम रेत में 
नाहे कौरा जाये चैन तेऊ पेट मे
नाय मिलती दुहन्नी जाय भेंट में
जाके मुफ्त में ही बिकें गेँहू धान रे
काहे धरने पे बैठयो है किसान रे ।

खेती आलू गोभी,कोई बागवानी है
बीज महंगों मिले, मिले नाय पानी है 
महँगी बिजली से,आफत किसानी है
टिड्डी दल, चौंपा ,ओले तूफानी है
खेती सबइ मुसिबतन की खान रे
चौ धरने पे बैठायो किसान रे ।

टोटे मद्दे मे ही ,पालै संतान कू
खुद भूखों रहे अन्न ,हिंदुस्तान कू
जिंदा रखतो सदा ही स्वाभिमान कू
मेरो कोटिक प्रणाम,है किसान कू
जाको छोरा ठाड़यो,सीमा पे जवान रे ।

काहे धरने पे बैठयो है किसान रे

अंधी बहरी बनबैठी सरकार है 
खुद अपनो से करें तक़रार है
सत्ता दम्भ के ही सब आसार है
भेजू लानत हजार बार बार है 
लेउ बापस हठीली हठ ठान रे ।

काहे धरने पे बैठयो है किसान रे 

मेरे भारत की आत्मा और प्रान रे 
काहे धरने पे बैठयो है किसान रे ।

एक रात कोही रैन बसेरा है
उड़ जानो कल होंत सबेरा है
छट जानो सब घनो अंधेरा है 
काहे पक्षपात करे तेरो मेरा है 
हाय पल में ही झड़ जाय गुमान रे
काहे धरने पे बैठ्यो है किसान रे 

रूपेश धनगर,पचावर
बालाजीपुरम, मथुरा
मो-9410490520