रविवार, 24 नवंबर 2019

बन्दूक

दोहा 

बंदूकों की गोलिया या लश्कर का साथ 
मज़बूरी में ही दिखे कलमकार के हाथ 

चहुदिश से लुटता दिखे अपना हक्क हकूक
 कलम चलैया हाथ भी थाम लेत बन्दूक

रुपेश धनगर मथुरा 
Mo 9410490520,9760986966

बुधवार, 20 नवंबर 2019

बेटा

  कैसे तुझे खिलाऊ
  कैसे तुझे मनाऊ 

तू रोयेगा दिल टूटेगा 
अश्को का सागर फूटेगा 
कैसे में बहलाऊ 


अहलादित हु तुझको पाकर 
तुझपर तन मन धन न्योछावर 
घी के दिए जलाऊ 



मुझको प्राणो से प्यारा है
 तू सूरज चंदा तारा है 
बार बार बलि जाऊ 



 तेरी आज बलाये लेलु 
घुटनो के बल संग में खेलु 
में  बचपन दोहराऊं


पूत मेरे में तेरी माँ हु 
आस मेरी तू ,में तेरी जा हु 
कैसे में समझाऊ 


ढेरो खेल खिलोने देकर 
बाल,कपोल सलोने छूकर 
ह्रदय से चिपटाऊ 



ऊँगली  पकड़ के तुझे घुमा दू 
अपना जीवन तुझे थमा दू 
कंधो पर बैठाऊ 


खुशियों से दामन को भर दू 
आज धरा पर एम्बर धर दू 
हीरे मोती   लुटबाऊ 



निंदिया रानी को बुलबाकर 
अमृत जैसा दूध पिलाकर 
लोरी तुझे सुनाऊ 


रुपेश धनगर मथुरा 
9410490520,9760986966

रविवार, 17 नवंबर 2019

दोहे धनगर के

 बस मंचो से हो रहा सिर्फ प्रकट ही खेद
 सदियों से पोषित हुए जातिबाद मनभेद  


  सदियों से होता रहा बेइज्जत अपमान 
  निर्धन के हिस्से नहीं  रत्तीभर सम्मान 



 मेहनत में ही चूर है ,    बहा पसीना खून
को समझा इस देश में,हलधर का मजमून 



 जहरीली आवोहवा ,जीना है दुस्वार
 दिल्ली अपने कर्म की झेल रही है मार 


 
 

दोहे धनगर के

 ताक़तवर गोली नहीं, बड़े प्रेम के बोल 
  धीरे धीरे प्रेम से ,अन्तस् के पट खोल


माँ के कदमो में निरे जन्नत के खलिहान 
माँ की सूरत ही लगे  अल्हा ओ भग़वान 


आज तलक देखा नहीं,ईस्वर का आकार 
माँ के चरणों में मिला सव जीवन का सार 

में सत का गामी सदा,तनिक न भाता झूठ 
 झूठे को झूठा कहु  कोई जाओ रूठ 


झंझावात संसार के,रोज नया संघर्ष 
झुण्ड अभावो के गुथे, कैसे हो उत्कर्ष 

गुरुवार, 14 नवंबर 2019

मनहरण घनाक्षरी

 रूपवान श्याम वर्ण मकराकृति कुण्डल कर्ण माथे पे तिलक सर मोर पंख भायो है 
पैंजनिया पैर पिली पटुका गले में डॉर काली सी कामरिया धार हिय हरषायो है
 शक्ति रूप शक्तिशाली भक्तन को वनमाली प्रेम को पुजारी कृष्ण सावरो कहायो है 
धन्य धान्य युक्त ब्रज हो दवाव मुक्त कोप से वचाने हेतु 
गिरवर उठायो है 


नख पे उठायो गिरी प्रलय से बचायो ब्रज क्ष न में ही मारे  मान इंन्द्र घबरायो है 
गली और गिरारे गाम ाथो याम राधेश्याम प्रेम के पुजारियों ने सुबह शाम गायो है 
राधा की दुलारी प्यारी सखियों के मन मान मोर बनयायो श्याम रास हु रचायो है 
योग ऋषि प्रेम ऋषि कर्म ऋषि सावरे ने बासुरी ु बजायी और चक्र भी उठायो है 

माँ मनहरण घनाक्षरी

 माँ का विशिष्ट रूप छाव हो कड़ी धूप जग में ममत्व प्यारे लाल पे लुटाती है 
हरपाल देखभाल चाहे फिर जो भी हाल गीले में सके खुद सूखे में सुलाती है
ऐशी जग जननी का करू क्या बखान खुद मेरी लेखनी ही लिखना भूल जाती है 
माँ के सामान दुनिया में अल्फाज नहीं मुझे हर श्रेष्ठता में माँ ही दिख जाती है 



रुपेश धनगर मथुरा 
मो-९४१०४९०५२०   

मत्तगयन्द सबैया

                       मत्तगयंद सबैया 
                             (1)
जा दिन ते गोपाल गए ,ब्रज काल लगे मोकू सुकुमारी 
कंटक कोटिक गाथ चुभे ,जे शूल लगें ब्रज की फुलबारी
व्याकुल खग मृग बरषत है दृग, चित्तमे चैन न रेन सुखारी
दीखत आठो याम चहुँदिशि ,नन्द को नंदन कृष्ण मुरारी  
                             {2}
राह तके ब्रजराज की ग्वाल,कहाँ गोपाल कहाँ गिरधारी
खावत, पीबत, बैठत,डोलत, हियरा बीच बसों बनबारी
सिगरे काम भुलाबहि,धावहि,बतराबहि सब ब्रज की नारी
दीखत आठो याम चहुँ दिशि,नंद को नंदन कृष्ण मुरारी
                             (3)
सुनें ही बाग तड़ाग निहारत,सूंन भई मधुवन की क्यारी
सुनें कूप करील के कुंजन,सुनें ही कूल कदम्ब की डारी
जै बसुधा ब्याकुल अति लागत,ब्याकुल डोलत धेनु बिचारी
है मनमोहन छोड़ चले कित,पलटो बेगि लेउ नेह निहारी
                           (4)
धीर धरे ते कहाँ बिगरे, गोपाल की याद न जाय बिसारी
आग लगी बिरहा के मनमें ,जमुना की लहर ज्यो तेग दुधारी
कल तक चहकत डोलत संखिया,छूट रही बृज में किलकारी
दीखत आठों याम चहुँ दिशि, नंद को नंदन कृष्ण मुरारी
 
                               



बुधवार, 13 नवंबर 2019

नारी (मनहरण घनाक्षरी )

 नारी है गुणों की खान काहे करे अपमान नारी माता बैष्णो माता काली भवानी है 
नारी ही करौली बाली नारी ही है शेरा बाली नारी बरसाने में ही प्यारी राधा रानी है 
नारी ही है सर्वश्रेष्ठ पूजता समूचा विश्व स्वर्ण अक्सरो में लिखी नारी की कहानी है 
किये थे फिरंगी दंग रन में लड़ी थी जंग ेशी मर्दानी नारी झाँसी वाली रानी है 



रुपेश धनगर मथुरा 
9410490520

गीत वृन्दावन

                               गीत 

कण कण खुशबु फूलो सी ब्रज की माटी ही चन्दन है 
जहा राधेश्याम बसें दिल में श्री धाम मेरा बृन्दावन है 



आजाओ ब्रज में भ्रमण करे संकल्पो का स्मरण करे
कोई मुश्किल ेशा काम नहीं करते जिसको घनश्याम नहीं वृन्दावन नगरी प्यारी है जाऊ जापे बलिहारी है 
दीनो के दीनानाथ यहाँ बस् ते है बांके विहारी है 
हर आने जाने बाले को पैदल या रिक्क्षे बाले को 
श्री राधे का उद्बोधन है श्री कृष्णा कहने बालो को 
हर अतिथि का सत्कार यहाँ व्रजबासी देते प्यार यहाँ 
रिश्तो की समझ नहीं जिनको उनको मिल जाए सार यहाँ 
ले प्यार पगी मीठी बोली हर रही का अभिनन्दन है 
जहा राधे श्याम बसें दिल ................


Brindavan बांकेबिहारी है गोवेर्धन में गिरिधारी है
 है नंदगाव नटखट वासी बरसाने राधा प्यारी है 
गोकुल में जा गोपाल बेस गोपाल सखा ब्रजबासी है 
महावन में है मोहन प्यारे दाऊजी में हलधारी है 
है लता पत्तये देव तुल्य खग मृग मधुकर बनमाली है ब्रज नारी रखती सखी भाव ये बसुंधरा मतवाली है 
है रंगभरे त्यौहार यहाँ मीथीउ लगती गाली है 
तीनो लोको के जगन्नाथ मथुरा में यशोदा नंदन है 
जहा राधे श्याम बसें दिल में .....


हाथो में पूजा की थाली संग  राधे राधे ताली 
यहाँ श्याम रंग की देख छटा दुनिया हो जाए मतवाली 
रसिको की महफ़िल है प्यारी कहु महक रही सरसो क्यारी 
कहु स्वर है ढोल नगाड़ो के राधे राधे जयकारो के 
यहाँ नित नए रोज भक्ति के दृश्य करते रहते है मोर नृत्य
चहुंदिश सदियों से गुंज रहा श्री कृष्ण नाम का स्यंदन है 

जहा राधे श्याम बसें दिल में .....



रुपेश धनगर मथुरा  
9410490520

सोमवार, 11 नवंबर 2019

दोहा

 रिश्तो में जब खिची ,कोई एक लकीर ।
 देख न पाया पुत्र भी,बूढ़ी माँ की पीर ।।



समरथ से हिलमिल करे, बेगाने भी प्यार।
 गम भूले मजबूर के   ,अपने रिश्तेदार ।।


धनवानों  के नाम है ,भोंगो के अम्बार ।
निर्धन इस जग में रहा ,रोटी को लाचार।।



 घृणा बसी जिनके हिये बसे ईर्ष्या द्वेष ।
वे सब निरे पिशाच है नर नारी के बेष ।।


ताकतबर के खूब है ,तारीफों के शोर ।
निर्बल के मत्थे मढे ,आरोपों के जोर ।।



दरवारो ने कब सुनी  , लाचारों की चीख ।
गुप्तदान मठ को मिले ,भूखे मिली न भीख ।।



घर घर सबके बन रहे , हलुआ पूड़ी खीर ।
निर्धन के हिय में बसी ,लाचारी की पीर ।।



रंग विषम भाषा विषम,विषम विविध परिधान।
 विषम विविधता एकता  ,भारत की पहिचान ।।


  आहट से बरषात की  ,  नाचे दादुर मोर ।
   एक आहट धडकत जिया ,दूजे भागे चोर ।।


 शरद ऋतु में गाँव की, लगे सुहानी भोर।
 हरी घास शवनम गिरी ,मतवाली चहुओर ।।



शवनम धवल सुहावनी ,पीली सरसो क्यार ।
जैसे  चुनरी धारकर ,किये प्रकृति श्रृंगार ।।




रुपेश धनगर पचावर मथुरा 
ब्रजभूमि काव्य मंच मथुरा 
उत्तर प्रदेश 
मो -9410490520