सोमवार, 11 नवंबर 2019

दोहा

 रिश्तो में जब खिची ,कोई एक लकीर ।
 देख न पाया पुत्र भी,बूढ़ी माँ की पीर ।।



समरथ से हिलमिल करे, बेगाने भी प्यार।
 गम भूले मजबूर के   ,अपने रिश्तेदार ।।


धनवानों  के नाम है ,भोंगो के अम्बार ।
निर्धन इस जग में रहा ,रोटी को लाचार।।



 घृणा बसी जिनके हिये बसे ईर्ष्या द्वेष ।
वे सब निरे पिशाच है नर नारी के बेष ।।


ताकतबर के खूब है ,तारीफों के शोर ।
निर्बल के मत्थे मढे ,आरोपों के जोर ।।



दरवारो ने कब सुनी  , लाचारों की चीख ।
गुप्तदान मठ को मिले ,भूखे मिली न भीख ।।



घर घर सबके बन रहे , हलुआ पूड़ी खीर ।
निर्धन के हिय में बसी ,लाचारी की पीर ।।



रंग विषम भाषा विषम,विषम विविध परिधान।
 विषम विविधता एकता  ,भारत की पहिचान ।।


  आहट से बरषात की  ,  नाचे दादुर मोर ।
   एक आहट धडकत जिया ,दूजे भागे चोर ।।


 शरद ऋतु में गाँव की, लगे सुहानी भोर।
 हरी घास शवनम गिरी ,मतवाली चहुओर ।।



शवनम धवल सुहावनी ,पीली सरसो क्यार ।
जैसे  चुनरी धारकर ,किये प्रकृति श्रृंगार ।।




रुपेश धनगर पचावर मथुरा 
ब्रजभूमि काव्य मंच मथुरा 
उत्तर प्रदेश 
मो -9410490520


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