देख न पाया पुत्र भी,बूढ़ी माँ की पीर ।।
समरथ से हिलमिल करे, बेगाने भी प्यार।
गम भूले मजबूर के ,अपने रिश्तेदार ।।
धनवानों के नाम है ,भोंगो के अम्बार ।
निर्धन इस जग में रहा ,रोटी को लाचार।।
घृणा बसी जिनके हिये बसे ईर्ष्या द्वेष ।
वे सब निरे पिशाच है नर नारी के बेष ।।
ताकतबर के खूब है ,तारीफों के शोर ।
निर्बल के मत्थे मढे ,आरोपों के जोर ।।
दरवारो ने कब सुनी , लाचारों की चीख ।
गुप्तदान मठ को मिले ,भूखे मिली न भीख ।।
घर घर सबके बन रहे , हलुआ पूड़ी खीर ।
निर्धन के हिय में बसी ,लाचारी की पीर ।।
रंग विषम भाषा विषम,विषम विविध परिधान।
विषम विविधता एकता ,भारत की पहिचान ।।
आहट से बरषात की , नाचे दादुर मोर ।
एक आहट धडकत जिया ,दूजे भागे चोर ।।
शरद ऋतु में गाँव की, लगे सुहानी भोर।
हरी घास शवनम गिरी ,मतवाली चहुओर ।।
शवनम धवल सुहावनी ,पीली सरसो क्यार ।
जैसे चुनरी धारकर ,किये प्रकृति श्रृंगार ।।
रुपेश धनगर पचावर मथुरा
ब्रजभूमि काव्य मंच मथुरा
उत्तर प्रदेश
मो -9410490520
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