मत्तगयंद सबैया
(1)
जा दिन ते गोपाल गए ,ब्रज काल लगे मोकू सुकुमारी
कंटक कोटिक गाथ चुभे ,जे शूल लगें ब्रज की फुलबारी
व्याकुल खग मृग बरषत है दृग, चित्तमे चैन न रेन सुखारी
दीखत आठो याम चहुँदिशि ,नन्द को नंदन कृष्ण मुरारी
{2}
राह तके ब्रजराज की ग्वाल,कहाँ गोपाल कहाँ गिरधारी
खावत, पीबत, बैठत,डोलत, हियरा बीच बसों बनबारी
सिगरे काम भुलाबहि,धावहि,बतराबहि सब ब्रज की नारी
दीखत आठो याम चहुँ दिशि,नंद को नंदन कृष्ण मुरारी
(3)
सुनें ही बाग तड़ाग निहारत,सूंन भई मधुवन की क्यारी
सुनें कूप करील के कुंजन,सुनें ही कूल कदम्ब की डारी
जै बसुधा ब्याकुल अति लागत,ब्याकुल डोलत धेनु बिचारी
है मनमोहन छोड़ चले कित,पलटो बेगि लेउ नेह निहारी
(4)
धीर धरे ते कहाँ बिगरे, गोपाल की याद न जाय बिसारी
आग लगी बिरहा के मनमें ,जमुना की लहर ज्यो तेग दुधारी
कल तक चहकत डोलत संखिया,छूट रही बृज में किलकारी
दीखत आठों याम चहुँ दिशि, नंद को नंदन कृष्ण मुरारी
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