धीरे धीरे प्रेम से ,अन्तस् के पट खोल
माँ के कदमो में निरे जन्नत के खलिहान
माँ की सूरत ही लगे अल्हा ओ भग़वान
आज तलक देखा नहीं,ईस्वर का आकार
माँ के चरणों में मिला सव जीवन का सार
में सत का गामी सदा,तनिक न भाता झूठ
झूठे को झूठा कहु कोई जाओ रूठ
झंझावात संसार के,रोज नया संघर्ष
झुण्ड अभावो के गुथे, कैसे हो उत्कर्ष
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